Saturday, September 13, 2008
Local Vs Migrants (New Playground for Regional Politics)
Wednesday, July 23, 2008
दुबेजी और कुमारी नेने की प्रेम कहानी
बस घर बस जाए उनका सबसे यही कहेते थे
राह में चलते चलते पढी नज़र नेने कुमारी पे
तरो ताज़ा हो उठे जैसे उठ गए हो किसी बीमारी से
उनको मालूम नही था की किस्मत उन पर छा जायेगी
जैसी भी हो उस मराठी पुत्री को उनकी सूरत भा जायेगी
पहले गियर में आ रही थी दुबेजी प्रेम की कार
मगर कहीं कहीं पढ़ती थी भाषा की मार
जब भी करते थे प्रेम की बात नेने कहती थी I GO (आइगो )
बेचारे दुबेजी कहते तब जाओ समझ नही पाते क्यों गयी वोह
बढ़ाने को आगे अपने प्रेम की कहानी
उन्होंने मराठी सीखने की ठानी
मराठी के प्रति उनमे बालक समान जागी उत्सुकता
किताबें पढ़ते नही लेकिन शेहेर के सारे मराठी बोर्ड पढ़ डाले
क्यों ना हम एकांत में प्रेम में डूबे रहें
ऐसा बोली जब नेने तो समझ नही आया क्या जवाब दें
दुबेजी तुंरत बोले ट्रैफिक का बोर्ड देख
मना चा ब्रेक उत्तम ब्रेक
जब नेने के पिताजी ने दुबेजी को छाए पर बुलाया
शादी कब करोगे इस सवाल का उत्तर समझ नही आया
सोच सोच समझ नही आ रहा था क्या जवाब देई
मराठी में बोल पढ़े अति घाई संकटात नई
Wednesday, June 18, 2008
Biased and Manipulative Media
from somebody from CNN IBN,saying why a common man making hue and cry over petrol. As all other liquids like dettol, coffee , laser jet ink are far more expensive than Petrol. I think media has lost its creative thinking and come out with these kiddish arguements.Its like comparing water with some expensive perfume and telling water is still cheap, even sold at 25 rs/litre in mall and cinema hall.
Thursday, June 5, 2008
भ्रम
आज खोया था पुरानी यादों में
मन की कुटिया में धुंधला सा दीप टिमटिमा रहा था
अचानक दस्तक दी किसी ने दर पर
ऐसा लगा जैसे कोई आ रहा था
अचानक दिमाग के अंधेरे को चीरती हुई एक किरण आयी
उसने मेरे मन के चित्रपट पर कुछ मिथ्या तस्वीर बनायी
जब मैं जागा उस सपन सलोने से
तब् मैंने रोका उसे अपना होने से
वो बोला क्यों रोकते हो मुझे अपनी आसक्ति से
क्यों बैर लेते हो विश्व की प्राणशक्ति से
मैं ही मानव देह को भूख सेहेने की ताक़त देता हूँ
भले ही कुच्छ क्षण के लिए परन्तु उनके दुःख हर लेता हूँ
रोजी की तलाश करते करते थक जाता है नौजवान
तब् मेरा सहारा लगता है उसके वस्त्रों में पैबंद समान
कुछ दीवाने मेरी ओर बढ़ते हैं मुझे मंजिल जान
पर उनके पहुँचने पर लुप्त हो जाता हूँ म्रग्त्रिश्ना समान
मेरे मन ने कहा क्यों ठुकराते हो जो निर्बल की ताक़त है
आओ मेरे मीत मेरे भ्रम मेरी मन कुटीर में तुम्हारा स्वागत है
समीरWednesday, May 28, 2008
बालक का भविष्य
जब शाम घर हमारे आए प्रोफेस्सर रामदास
हम बोले "जन्म हुआ बालक का फ़िर क्यों हो इतने उदास"
बड़े अनमानते हुए बोले "मुझे कोई चीज़ नही भाती
क्या होगा भविष्य नवजात शिशु का यही चिंता मुझे सताती"
हमने कहा क्या मुश्किल यह पता लगाने में
बंद कर दो उसे एक कक्ष अनजाने में
हो जहाँ रखा एक सेब , रुपया और एक गीता
फ़िर देखना तुम वेह बाल किसका स्पर्श करता
गर उठा कर सेब चबयेगा
तो धरा की सेवा कर किसान बन जाएगा
गर उठा रुपया खेलेगा और खेलेगा खेल
बन उद्योगपति रखेगा , लक्ष्मी को डाल नकेल
उठा लेता अगर हाथ में भगवत पुराण
बड़ा हो बनेगा पंडित ज्ञानी और विदुआं
प्रोफेस्सर ने शंका की साँस भरी
और अपने आगे की बात कही
अगर वेह उठाता एक हाथ में सेब दूजे में रुपया
और बैठ जता गीता पर
वेह ना बनेगा उद्योगपति ना ही स्कॉलर
हमने कहा फ़िर आपके बच्चे का भविष्य बहुत उज्जवल है
उसके एक पैर के नीचे आज है दूजे के नीचे कल है
यह वेह शख्सियत है बुध्धि सबकी हर लेता है
वेह और कोई नही भावी राजनेता है
-समीर
Tuesday, May 27, 2008
सरकारी अफसर
देख लोग हैरान थे की आयी विपदा भारी
देखकर सबने उसकी दारुण अवस्था ,
अपना हाथ बढाकर हाथ 'देने' को कहा
परन्तु अफसर ने नही बढाया अपना हाथ,
लोग चकित थे देख अनहोनी बात
खींच रहा था दलदल उस हाड मांस के दोने को,
जैसे खींच रहा हो कोई नरभक्षी पौधा किसी कीट सलोने को
हैरान तथा बेबस थी मानव श्रंखला ,
समझ कोई नही पा रहा था की करें तो क्या करें भला
अफसर को बचाने के लिए उस नीर से ,
एक समझदार युवक बढ़ा उस भीड़ से
अफसर की विवशता को समझ गया वो,
अपने करो को सामने रखकर बोला हाथ 'लो'
युवक के हाथ में उसने अपना हाथ दिया,
इस प्रकार उसने अपने को डूबने से बचा लिया
हैरान थे लोग अफसर के इस व्यवहार से,
लोगों की हालत समझ युवक बोला बड़े गुमार से
यह शख्स सरकारी अफसर है,
इसके लिए लेना जीवन और देना म्रत्यु के बराबर है
इसलिए जो मना कर रहा था हाथ अपना हाथ देने से,
वेह चूका नही मेरा हाथ लेने से
यही है जो भ्रष्टाचार को सेते हैं ,
यह दुआएं देते नही बस आम आदमी की बाद दुआ लेते हैं
-समीर