आज खोया था पुरानी यादों में
मन की कुटिया में धुंधला सा दीप टिमटिमा रहा था
अचानक दस्तक दी किसी ने दर पर
ऐसा लगा जैसे कोई आ रहा था
अचानक दिमाग के अंधेरे को चीरती हुई एक किरण आयी
उसने मेरे मन के चित्रपट पर कुछ मिथ्या तस्वीर बनायी
जब मैं जागा उस सपन सलोने से
तब् मैंने रोका उसे अपना होने से
वो बोला क्यों रोकते हो मुझे अपनी आसक्ति से
क्यों बैर लेते हो विश्व की प्राणशक्ति से
मैं ही मानव देह को भूख सेहेने की ताक़त देता हूँ
भले ही कुच्छ क्षण के लिए परन्तु उनके दुःख हर लेता हूँ
रोजी की तलाश करते करते थक जाता है नौजवान
तब् मेरा सहारा लगता है उसके वस्त्रों में पैबंद समान
कुछ दीवाने मेरी ओर बढ़ते हैं मुझे मंजिल जान
पर उनके पहुँचने पर लुप्त हो जाता हूँ म्रग्त्रिश्ना समान
मेरे मन ने कहा क्यों ठुकराते हो जो निर्बल की ताक़त है
आओ मेरे मीत मेरे भ्रम मेरी मन कुटीर में तुम्हारा स्वागत है
समीर
2 comments:
Bhaiyyya jee ... thoda humaare favourite post keejiye !
bahut khubsurat rachna. dam hai. likhte rahiye. shubhkamnayen.
---
ulta teer
Post a Comment