Wednesday, July 23, 2008

दुबेजी और कुमारी नेने की प्रेम कहानी

गोरखपुर के दुबेजी जो पेशवाई शेहेर में रहते थे
बस घर बस जाए उनका सबसे यही कहेते थे
राह में चलते चलते पढी नज़र नेने कुमारी पे
तरो ताज़ा हो उठे जैसे उठ गए हो किसी बीमारी से
उनको मालूम नही था की किस्मत उन पर छा जायेगी
जैसी भी हो उस मराठी पुत्री को उनकी सूरत भा जायेगी
पहले गियर में आ रही थी दुबेजी प्रेम की कार
मगर कहीं कहीं पढ़ती थी भाषा की मार
जब भी करते थे प्रेम की बात नेने कहती थी I GO (आइगो )
बेचारे दुबेजी कहते तब जाओ समझ नही पाते क्यों गयी वोह
बढ़ाने को आगे अपने प्रेम की कहानी
उन्होंने मराठी सीखने की ठानी
मराठी के प्रति उनमे बालक समान जागी उत्सुकता
किताबें पढ़ते नही लेकिन शेहेर के सारे मराठी बोर्ड पढ़ डाले
क्यों ना हम एकांत में प्रेम में डूबे रहें
ऐसा बोली जब नेने तो समझ नही आया क्या जवाब दें
दुबेजी तुंरत बोले ट्रैफिक का बोर्ड देख
मना चा ब्रेक उत्तम ब्रेक
जब नेने के पिताजी ने दुबेजी को छाए पर बुलाया
शादी कब करोगे इस सवाल का उत्तर समझ नही आया
सोच सोच समझ नही आ रहा था क्या जवाब देई
मराठी में बोल पढ़े अति घाई संकटात नई

2 comments:

Passionate Tester said...

Kahi ye Dubey ji aap to nahi :)

Good one!!!

AMIT said...

Nice Prem Kahani.

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